–अनुराग ‘कर्म करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. हमारा कर्म सफल होगा या नहीं, हमें इस की तो परवाह करनी ही नहीं चाहिए, हम काम पूरा कर पाएँगे या नहीँ– इस की भी चिंता नहीं करनी चाहिए.’ वह अपने कई उदाहरण देते हैं, ‘दिल्ली आ कर काम शुरू करते ही हमारे घर मॉडल टाउन में 1978 की भयानक बाढ़ आ गई. सात फ़ुट तक पानी भर आया. अगर हमारे कार्ड 10 फ़ुट ऊपर वाली मियानी में न होते, तो सारी मेहनत धरी धराई रह जाती… 1988 में मुझ पर दिल का बेहद भारी दौरा पड़ा. उस समय मैं अस्पताल मेँ ही …
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–अनुराग ‘कर्म करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. हमारा कर्म सफल होगा या नहीं, हमें इस की तो परवाह करनी ही नहीं चाहिए, हम काम पूरा कर पाएँगे या नहीँ– इस की भी चिंता नहीं करनी चाहिए.’ वह अपने कई उदाहरण देते हैं, ‘दिल्ली आ कर काम शुरू करते ही हमारे घर मॉडल टाउन में 1978 की भयानक बाढ़ आ गई. सात फ़ुट तक पानी भर आया. अगर हमारे कार्ड 10 फ़ुट ऊपर वाली मियानी में न होते, तो सारी मेहनत धरी धराई रह जाती… 1988 में मुझ पर दिल का बेहद भारी दौरा पड़ा. उस समय मैं अस्पताल मेँ ही …
पीटीआई-भाषा संवाददाता 20:41 HRS IST नयी दिल्ली, 16 जून :भाषा: हिन्दी अकादमी, दिल्ली ने वर्ष 2010-11 के कुल आठ सम्मानों की घोषणा कर दी। इस वर्ष समांतर कोश हिंदी थिसारस तैयार करने वाले अरविंद कुमार को संस्थान के उच्चतम पुरस्कार शलाका सम्मान से विभूषित करने की घोषणा की गयी। अकादमी के सचिव रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने आज यहां बताया कि इस …
Figure 1 अरविंद कुमार “शब्द मनुष्य की सब से बड़ी उपलब्धि हैँ, प्रगति के साधन और ज्ञान विज्ञान के भंडार हैँ, शब्दोँ की शक्ति अनंत है.” यह कहना है कोशकार अरविंद कुमार का, जिन्हेँ हिंदी अकादेमी दिल्ली द्वारा इस साल शलाका सम्मान से अलंकृत किया जा रहा है. शब्दोँ के संकलन और कोटिकरण मेँ वह 81-वर्षीय जीवन के लगभग चालीस साल से अकेले ही नहीँ अपने पूरे परिवार के साथ शक्ति की साधना करते रहे हैँ. अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैँ: “संस्कृत के महान वैयाकरणिक महर्षि पतंजलि का कथन …
बाल श्रमिक से शब्दाचार्य तक की यात्रा : हम नींव के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते। सचमुच अरविंद कुमार नाम की धूम हिंदी जगत में उस तरह नहीं है जिस तरह होनी चाहिए। लेकिन काम उन्होंने कई बड़े-बड़े किए हैं। हिंदी जगत के लोगों को उन का कृतज्ञ होना चाहिए। दरअसल अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस की रचना कर हिंदी को जो मान दिलाया है, विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं के समकक्ष ला कर खड़ा किया है, वह न सिर्फ़ अद्भुत है बल्कि स्तुत्य भी है। कमलेश्वर उन्हें शब्दाचार्य कहते थे। हिंदी अकादमी, दिल्ली ने हिंदी भाषा और साहित्य के …
एक सार्थक और प्रेरक ज़िंदगी जी है अरविंद कुमार ने Figure 1 – तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की पहली प्रति भेंट करते अरविंद कुमार दंपति. 13 दिसंबर 1996. यह अरविंद कुमार की पहली प्रकाशित पुस्तक थी. तब अरविंद 66वाँ वर्ष पूरा कर रहे थे. आज जब अरविंद कुमार को हिंदी अकादेमी दिल्ली ने शलाका सम्मान से विभूषित किया है तो उन्हेँ याद आते हैँ 1945 से शुरू होते कुछ दिन. जनवरी मेँ वह पंदरह साल के हुए थे, मैट्रिक की परीक्षा मेँ बैठ चुके …
–अरविंद कुमार
24 अप्रैल 2007 के हिंदुस्तान (दिल्ली) के मुखपृष्ठ पर छपे एक चित्र का कैप्शन–
“पीऐसऐलवी सी-8 से इटली के उपग्रह एजाइल को कक्षा मेँ स्थापित कर भारत ने ग्लोबल स्पेस मार्केट मेँ प्रवेश किया. इसरो की यह उड़ान पहली व्यावसायिक उड़ान थी. इसरो दुनिया की अग्रणी एजेसियोँ की श्रेणी मेँ आया. (श्रीहरिकोटा से) लांचिंग के दौरान सतीश धवन केँद्र के इसरो प्रमुख जी. माधवन व वरिष्ठ वैज्ञानिक मौजूद थे.”
यह है आज़ादी के साठवें वर्ष मेँ नौजवान हिंदुस्तान, और नौजवान हिंदी — संसार से बराबरी के स्तर पर होड़ करने के लिए उतावला हिंदुस्तान. और पूर्वग्रहोँ से मुक्त हर भाषा से आवश्यक शब्द समो कर अपने को समृद्ध करने को तैयार हिंदी, जो इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय नगर न्यू यार्क मेँ विश्व सम्मेलन कर रही है, और अपने लिए अधिकारपूर्वक जगह माँग रही है.
कहाँ 1947 का वह देश जहाँ एक सूई भी नहीँ बनती थी, जहाँ चमड़ा कमा …
एक औघड़ मलंग की याद में अधिकारी स्वतंत्र भारत के उदय के साथ हिंदी पत्रकारिता में धूमकेतु के समान अचानक उभरे और सिक्के पर सिक्के जमाते चले गए. ‘नवयुग’ के संपादन विभाग से उस के विख्यात संपादक तक. ‘समाज कल्याण’ मासिक से ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के संपादक तक. फिर ‘नवभारत टाइम्स’ के मुंबई संपादक तक. कई बरस उन्हों ने मुंबई के हिंदी जगत पर साम्राज्य किया. फिर वे अपने में समाते चले गए. एक अनोखा एकांत और एकाकीपन उन्हें घेरता चला गया. अरविंद कुमार १७ मई २००५
एक निजी विहंगावलोकन —अरविंद कुमार टाइम्स आफ़ इंडिया की वे प्रसिद्ध पत्रिकाएँ कहाँ हैँ, जो हिंदी का गौरव कहलाती थीँ. सब बंद हो गईं या कर दी गईं. हिंदी ही नहीँ, अँगरेजी के इलस्ट्रेटिड वीकली जैसे पत्र भी बंद करने पड़े. क्योँ? किसी के मन मेँ पत्रिका निकालने का कीड़ा घर कर ले, तो उसे आप लाख समझाएँ, वह अख़बार निकाल कर ही रहता है… बाद मेँ उस मित्र से शुभचिंतक एक ही प्रश्न कर सकते हैँ – क्या हैँ तुम्हारे हाल? ये बातेँ मैँ ने किसी को हतोत्साहित करने के इरादे से नहीँ कह रहा हूँ. मेरा उद्देश्य इतना ही है कि दुस्साहसी लोगोँ को पहले से ही सावधान कर दूँ. मैँ यह भी जानता हूँ कि जो लोग कुछ करना चाहते हैँ, वही कुछ कर …
एक प्रस्तुति मन में – तीन प्रस्तुतियाँ मंच पर… –अरविंद कुमार सितंबर १९९२ में मैं ने जब श्री रामगोपाल बजाज निर्देशित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों द्वारा अंधा युग की प्रस्तुति देखी तो अभिभूत हो कर डाक्टर धर्मवीर भारती को एक पत्र लिखा, जिस में उस का विभोर वर्णन किया. उस पत्र में मैं ने मेरी देखी पिछली कुछ प्रस्तुतियों का ज़िक्र भी किया था. तब भारती जी ने मुझे एक पत्र लिखा. वह चाहते थे कि मैं उन सब प्रस्तुतियों की विशिष्ठताओं को एक लेख में वर्णित करूँ. मुझे वह सब लिखने में काफ़ी समय लगा. ३ फ़रवरी १९९३ को मैं ने निम्न लेख उन्हें भेजा. भारती जी की अस्वस्थता के कारण वह उन के पास कहीं रखा रह गया. अब जब पुष्पा जी उन के पुराने काग़ज़ तलाश रही थीं, तो उन्हें यह लेख भी मिला. इस की टाइप प्रति में कई जगह मैं ने काट …
–अरविंद कुमार आज की तेजी से बढ़ती दुनिया मेँ हम लंबी छलाँगें लगाते नहीं दौड़े, तो पिछड़ेपन के गहरे दलदल मेँ धँसते चले जाएँगे. द्वंद्व, संघर्ष, टकराव जीवन की, प्रगति की, पहली शर्त हैँ. सृष्टि के आरंभ से हर जीवजाति, वनस्पति, समूह, इकाई आपस मेँ टकराते लड़ते भिड़ते कमज़ोर के विध्वंस और मज़बूत के उत्कर्ष के साथ आगे बढ़ते रहे हैँ. ये बड़ी बड़ी वैज्ञानिक सिद्धांत की बातें वैज्ञानिकों विचारकों के पल्ले डाल कर हम आधुनिक भारत के टकरावोँ पर नज़र डालेँ. आज के भारत की शुरूआत मैं सन ”47 से मान कर चलता हूँ. तब मैं 17 साल का था… देशभक्ति से भरपूर, दिल्ली काँग्रेस मेँ छोटे से स्वयंसेवक के तौर पर सक्रिय… उस साल की 14-15 अगस्त की रात हम लोगों की टोली ट्रक मेँ लद कर करोलबाग़ की सड़कों पर मस्ती मेँ झूमती नारे लगाती …
इतिहास का उलझा सवाल دارا شكوه रंगीन मुग़ल त्रासदी शाह आलम के बाद दाराशुकोह श्री मेवाराम का दूसरा उपन्यास है. दोनोँ का विषय मुग़लिया हिंदुस्तान है. उपन्यास मेँ लेखक का ज़ोर दारा के वैचारिक विकास का वर्णन करने पर है. विषय को शुष्क होने से बचाने के लिए मुग़ल दरबार की रंगीनियोँ के ढेरोँ क़िस्सोँ के साथ साथ अनेक दिलचस्प कहानियाँ और घटनाएँ बयान करने का सहारा लिया गया है… ये पाठक को आगे पढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती हैँ. तू काबा मेँ है और तू सोमनाथ के मंदिर मेँ है / तू चैत्यालय मेँ है और तू सराय मेँ है / तू ही एक समय पर प्रकाश भी है और पतिंगा भी है / तू ही हाला और तू ही प्याला / तू ही कवि और मूर्ख, मित्र और अपरिचित व्यक्ति भी है / तू ही गुलाब और उस से प्रेम …
न जाने क्योँ, शायद उस के व्यक्तित्व मेँ ही कुछ ऐसा था कि वह शुरू से भीम रहा, तुम रहा, आप कभी था ही नहीँ, न बन पाया यह कहना अजीब लग सकता है कि भीमसेन उस आदमी का नाम था जो हमेशा बेचैन रहता था. ऊपर से तो वह शांत ही रहता था, बातचीत हमेशा शांत स्वर मेँ करता था. किसी ने कभी उसे किसी पर कोप उतारते, कोसते नहीँ देखा. फिर बेचैन? हाँ, हमेशा बेचैन, अशांत, कुलबुलाता, विकल, उतावला, वर्तमान से असंतुष्ट. जी, हाँ, लगभग, लगभग क्योँ, बिल्कुल वैसा जैसा गोएथे (और उस से पहले मारलो) का फ़ाउस्ट… जिस की आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीँ हो सकतीँ… केवल एक अंतर के साथ… फ़ाउस्ट हर ऐश्वर्य का स्वामी बन जाता है, फिर भी असंतुष्ट है. भीमसेन से हर ऐश्वर्य हमेशा दूर रहा, लेकिन उस की आकांक्षाएँ फ़ाउस्ट की ही तरह एक के बाद दूसरी उपलब्धि की ओर …
अक्षरम् द्वारा आयोजित छठे अंतरराष्ट्रीय उत्सव 1-2-3 फ़रवरी 2008 नई दिल्ली के हिंदी अध्ययन और अनुसंधान सत्र के लिए –अरविंद कुमार
से पहले मैँ अध्यक्ष महोदय प्रो. हरमन वान आलफ़न को नमस्कार करता हूँ. मैँ कह नहीँ सकता कि उन्हेँ अध्यक्ष के रूप मेँ देख कर मुझे कितनी ख़ुशी हो रही है. इस का एक ख़ास कारण है–हमारे नवीनतम कोश द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी पर लगभग एक साल तक काम टैक्सस मेँ हुआ–डैलस मेँ. एक साल टैक्सस के उत्तरवर्ती राज्य ओक्लाहोमा के …
महाकवि योहान वोल्फ़गांग फ़ौन गोएथे कृत जरमन काव्य नाटक फ़ाउस्ट – एक त्रासदी अविकल हिंदी काव्यानुवाद भाग 1 – प्रस्तुति अरविंद कुमार इंटरनैट पर प्रकाशक अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा लि ई-28 पहली मंज़िल, कालिंदी कालोनी नई दिल्ली 110065 …
कहानी अपंग वैज्ञानिक स्टीफ़न हाकिंग की… प्रसिद्ध खगोलशास्त्री इतालवी गैलीलियो की मृत्यु के 300वें वर्ष 1942 मेँ ब्रिटेन मेँ जनमे स्टीफ़न हाकिंग आज संसार मेँ अपनी तरह के एकमात्र वैज्ञानिक हैँ. आइंस्टाइन के बाद भौतिकी मेँ आज हाकिंग का ही नाम लिया जाता है. उन के नाम के साथ जुड़े हैँ अत्यंत प्रख्यात सिद्धांत— ब्लैक होल, क्वांतम ग्रैविटी. वह सिद्धांत कास्मोलजी मेँ अपनी स्थापनाओँ के लिए भी जाने जाते हैँ. उन की सब से बड़ी ख़ूबी है कि वह विज्ञानियोँ को तो क़ायल कर ही सकते हैँ, आम आदमी को भी अपनी बात आसान भाषा मेँ समझा सकते हैँ. उन की छोटी सी क्रांतिकारी पुस्तक ए ब्रीफ़ हिस्टरी आफ़ टाइम — फ़्राम दे बिग बैंग टु ब्लैक होल्स लाखों लोगों ने पढ़ी और समझी है. बचपन मेँ वह संकोची क़िस्म के थे, लेकिन एक बात मन मेँ साफ़ थी कि विज्ञान पढ़ना है. पचास साल पहले …
वर्ड पावर – word power
आजकल सौंदर्य प्रतियोगिताएँ व्यापार बन गई हैँ. अंततोगत्वा इन के आयोजक सौंदर्य उपचारोँ के विज्ञापन दाताओँ को महँगी क़ीमत पर विश्वप्रसिद्ध माडल दिलाने वाली एजेंसी का ही काम कर पाते हैँ. जो भी हो, ख़ासोआम आदमी को सुंदरियोँ के चित्रोँ से आँखेँ सेँकने का माकूल बहाना मिल जाता है. सौंदर्य प्रतियोगिता कोई नई या अनोखी चीज़ नहीँ है. प्राचीन सभ्यताओँ मेँ गण सुंदरी, नगर सुंदरी आदि चुनी जाती थीँ. वैशाली की नगरवधु प्रतियोगिता प्रसिद्ध है. श्री भगवतीचरण वर्मा ने इस नाम के उपन्यास के द्वारा पाप और पुण्य को परखने की जो कोशिश की वह हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासोँ मेँ गिनी जाती है. आजकल सौंदर्य प्रतियोगिताएँ व्यापार बन गई हैँ. अंततोगत्वा इन के आयोजक सौंदर्य उपचारोँ के विज्ञापन दाताओँ को महँगी क़ीमत पर विश्वप्रसिद्ध माडल दिलाने वाली एजेंसी का ही काम कर पाते हैँ. जो भी …
दिल है हिंदुस्तानी की याद मेँ
सच तो यह है कि यह गीत आज़ाद हिंदुस्तान का मैनिफ़ैस्टो था, जो बड़े आत्मविश्वास के साथ खुली सड़क पर सीना ताने निकल पड़ा था. उस के लिए चलना जीवन की कहानी था और रुकना मौत की निशानी. वह फटेहाल था, लेकिन इस बिगड़े दिल शाहज़ादे की तमन्ना एक दिन सिंहासन पर जा बैठने और दुनिया को हैरान कर देने की थी… आज हमेँ वह सपना सच्चा होता नज़र आ रहा है… © अरविंद कुमार दखिए शैलेँद्र – मारे गए गुलफ़ाम जो सफ़र राज कपूर के साथ १९४९ मेँ फ़िल्म बरसात के तुम से मिले हम गीत से शुरू हुआ, वह राज कपूर के ही साथ दिसंबर १९६६ मेँ मेरा नाम जोकर के अधूरे गीत जीना यहाँ मरना यहाँ से ख़त्म हुआ… यह सफ़र था गीतकार शैलेँद्र का जिन्होँ ने उस भारतीयता को परिभाषित किया जिस …
सूफ़ी मार्क्सवादी
इसी टीम के शेष सदस्योँ ने शैलेँद्र की अरथी को सब से पहले कंधा दिया. यह उन्हीँ का अधिकार था. इस टीम की अलग पहचान यह थी कि यह बौद्धिक होते हुए भी दिल से सोचती थी, दिल से काम करती थी, और दिलोँ तक पहुँचना चाहती थी. इस का गणित दिल का था. © अरविंद कुमार देखिए शैलेंद्र पर एक और लेख मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है. वह दिन था १४ दिसंबर – राज कपूर का जन्मदिन. उस दिन राज कपूर की आत्मा जाती रही थी. और राज कपूर का हैरान खड़ा शरीर ताक रहा था उन पार्थिव अवशेषों को जो मुंबई मेँ कोलाबा के एक छोटे से नर्सिंग होम मेँ धरती पर रखे थे. ये अवशेष थे लोककवि और फ़िल्म गीतकार शैलेँद्र के. मुझे लगा जो खड़ा है और जो पड़ा है – जो है …
महावीर अधिकारी जीने की ललक, भरपूर भोगने की चाह, जीवन रस को तलछट तक सोख़ जाने की कुलबुलाहट – मात्र इतनी ही हो सकती है अधिकारी की परिभाषा. जो लोग बहुत क़रीब होते हैँ, अकसर उन के होने के ग़ुमान नहीँ रहता. वे हवा पानी और दाल रोटी की तरह दैनिक जीवन का अंग बन जाते हैँ. और जब उन के बारे मेँ किसी को बताने बैठो तो मालूम नहीँ पड़ता कि कहाँ से शुरू करो, क्या बताओ और क्या छोड़ दो. बेहद नज़दीक से देखने पर अनुपात भी बिगड़ जाता है. बड़ी चीज़ेँ ग़ायब हो जाती हैँ. छोटी चीज़ेँ बड़ी मालूम पड़ने लगती हैँ. अच्छी सुंदर काया बड़े छेदोँ से भरी नज़र आने लगती है. नज़दीक से देखे गए व्यक्ति की बड़ी बड़ी आकांक्षाएँ, छोटे छोटे स्वार्थ नज़र आने लगते हैँ. अधिकारी जी के बारे मेँ आप को बताते समय मेरी …
अक्षरम् द्वारा आयोजित छठे अंतरराष्ट्रीय उत्सव 1-2-3 फ़रवरी 2008 नई दिल्ली के हिंदी अध्ययन और अनुसंधान सत्र के लिए मैट्रिक मेँ नवीं कक्षा वाले शास्त्रीजी का नाम मुझे याद नहीँ. उन का पांडित्य मुझे याद है. उन के बाद उसी वर्ष आए हरभजन सिंह जी. पहली बार अध्यापन कर रहे थे, बाद मेँ उन्होँ ने डाक्टरेट की, ख़ालसा कालिज मेँ अँगरेजी के विभागाध्यक्ष बने, और पंजाबी कविता पर अमिट छाप छोड़ गए. मुझे उन्होँ ने जो दिया वह मैँ नहीँ भूल सकता. हिंदी शब्द संपदा मेँ मेरी रुचि उन्हीँ की देन है… आजकल स्कूलोँ मेँ बच्चोँ को नहीँ बताया जाता कि उन्हेँ कोश देखने चाहिएँ. हिंदी के कई शिक्षक न कोश देखते हैँ न विद्यार्थियोँ को कोश देखना सिखाते हैँ. मैट्रिक तक तो क्या, कालिज स्तर तक यही हाल है, सब से पहले मैँ अध्यक्ष महोदय …
हिंदी के आधुनिकतम पत्रकार अक्षय जी ने कहा कि प्रश्न उन की निजी सहमति या असहमति का था ही नहीँ. प्रश्न था कि क्या हमेँ भिन्न विचारोँ और अभिव्यक्तियोँ को प्रकाश मेँ लाने का अधिकार है या नहीँ? भारत को संकुचित मनोवृति से निकलना ही होगा… कोई रचना पसंद न आए तो कटु आलोचना करना उन का अधिकार है. मगर उस पर पाबंदी की माँग करना उन के सिद्धांतोँ व स्वभाव के विरुद्ध है. अगस्त या सितंबर 1957 के एक वर्षाहीन दिन दिल्ली का तपता हुआ तीसरा पहर. मन मेँ खीझ थी, क्रोध था, निराशा थी और झिझक थी. उसी दिन दोपहर को दिल्ली के एक अन्य बड़े दैनिक के तत्कालीन संपादक के व्यवहार ने मुझे पूरी तरह निराश कर दिया था. नवभारत टाइम्स के संपादक से भी वैसे ही व्यवहार की पूरी आशंका थी. अतः उन के पास जाने का …
Arvind had imagined that we would be able to complete the work in two years (it eventually took twenty!).
We decide to make a thesaurus Arvind first came to know of and use Roget”s work in 1952 and wished Hindi also had such a wonderful tool. He hoped that in the new spirit of dictionary making in India, a Hindi thesaurus would soon be made too. Two decades later, Arvind was in Bombay (now Mumbai), editing a Hindi fortnightly magazine, Madhuri, for the Times of India group. There was still no Hindi thesaurus on the horizon. On the evening of Christmas Day 1973, it occurred to him that he would have to make it. The next morning, we discussed the idea during our walk and decided to go ahead with the work. We were well aware that the colossal job would require our full-time dedication. Arvind would …
भारतीय महिलाएँ विदेशियों से पाँच गुना सुंदर हैं… एक अद्भुत प्रयास और एक अद्भुत उपलब्धि श्री अरविंद कुमार एवं श्रीमती कुसुम कुमार द्वारा निर्मित अँगरेजी-हि्दी//हिंदी-अँगरेजी थिसारस के लोकापर्पण के अवसर पर – 4.4.2008 इंडिया इंटरनेशनल सैंटर में उपस्थित सभी विद्वज्जन! आज का दिन हिंदी जगत में एक ऐतिहासिक दिन है. या कहना अधिक उपयुक्त होगा कि न केवल हिंदी प्रमियों के लिए, बल्कि विश्व भर में भारतीय मनीषा, साहित्य, भाषा, कला एवं संस्कृति के जिज्ञासुओं के लिए भी यह एक ऐतिहासिक ग्रंथ है. श्री अरविंद कुमार और श्रीमती कुसुम कुमार द्वारा निर्मित The English-Hindi/Hindi-English Thesaurus and Dictionary प्रकाशित हुए हैं जिन का आज लोकार्पण किया गया. भाषा एवं साहित्य औऱ हमारे जीवन के बीच जो संबंध है, उसे परिभाषित करना सरल भी है और इतना सरल नहीं भी है. भाषा ने संवाद की सुविधा प्रदान …
चले जाना एक घनिष्ठ मित्र का · जो साठ पैँसठ साल का अंतरंग संबंध तोड़ कर अचानक चला गया, उस के बारे मेँ लिखना आसान नहीँ होता, ख़ासकर तब जब आँखेँ नम होँ, दिल भरा हो… तरुण अवस्था के काँग्रेस सेवा दल के मित्रों मेँ से अब मंत्री ही बचा था. यशपाल गया… भगवती प्रसाद कक्कड़ (जो मंत्री और मुझे मिला कर करौल बाग़ काँग्रेस सेवा दल के बिग थ्री मेँ था) गया… और बहुत से चेहरे विलीन हो गए… कुछ बचे भी हैँ… यादव भाई (जीआरएस यादव)… पर वह भी शारीरिक अक्षमता से पीड़ित रहते हैँ… जब से यशपाल (कपूर) नेहरू जी के स्टाफ़ मेँ चला गया तो पूरा समय नहीँ दे पाता था. लेकिन हम लोगोँ की वैसी ही मित्रता उस के अंतिम दिनोँ तक वैसी ही रही. याद हैँ बँटवारे के बाद के वे दिन जब सुबह सुबह हम सब अजमल ख़ाँ …